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Tuesday, July 17, 2018

Mere hone ka ek aur ehsas

                । । ।   मैं तो दीया हूँ । । ।

   हाँ सच हैं 
लहराता हूँ सदमों मे फिर सम्हलता हूँ थोड़ी
बाती समेटता हूँ,
थोड़ी लौ ज़ब्त करता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.......
     घना तम ललकारता हैं, डरता है हर वक्त
    मुझे मेरी औक़ात बताता है
  छोटा हूँ पर न जाने क्यों उसे बेहद खलता हूँ
 मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ......
आँँधियाँ कभी इस कोने से
और कभी उस कोने से
अरे,कभी- कभी तो मेरे ही बिस्तर-बिछौने से
वार करती हैं
मैं नींद की गहरी सुरंगों से
 एक सैनिक बन के निकलता हूँ.....
उसको दीप दिखाता हैं
शाम ढले मे ही परछाईं पर
पैरों को रख ठुमक -ठुमक कर चलता हूँ 
        मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
मैं जलता हूँ फिर बुझता हूँ
मैं बुझता हूँ फिर-फिर जलता हूँ
हाँ मैं
रह -रह कर बुझता हूँ जलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
हाँ मैं तो दीया हूँ....।।।

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