Thursday, July 26, 2018
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Mai tumko sochta hu
DINESH TOPPO
July 26, 2018
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। । । मैं तो दीया हूँ । । ।
हाँ सच हैं
लहराता हूँ सदमों मे फिर सम्हलता हूँ थोड़ी
बाती समेटता हूँ,
थोड़ी लौ ज़ब्त करता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.......
घना तम ललकारता हैं, डरता है हर वक्त
मुझे मेरी औक़ात बताता है
छोटा हूँ पर न जाने क्यों उसे बेहद खलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ......
आँँधियाँ कभी इस कोने से
और कभी उस कोने से
अरे,कभी- कभी तो मेरे ही बिस्तर-बिछौने से
वार करती हैं
मैं नींद की गहरी सुरंगों से
एक सैनिक बन के निकलता हूँ.....
उसको दीप दिखाता हैं
शाम ढले मे ही परछाईं पर
पैरों को रख ठुमक -ठुमक कर चलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
मैं जलता हूँ फिर बुझता हूँ
मैं बुझता हूँ फिर-फिर जलता हूँ
हाँ मैं
रह -रह कर बुझता हूँ जलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
हाँ मैं तो दीया हूँ....।।।
घना तम ललकारता हैं, डरता है हर वक्त
मुझे मेरी औक़ात बताता है
छोटा हूँ पर न जाने क्यों उसे बेहद खलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ......
आँँधियाँ कभी इस कोने से
और कभी उस कोने से
अरे,कभी- कभी तो मेरे ही बिस्तर-बिछौने से
वार करती हैं
मैं नींद की गहरी सुरंगों से
एक सैनिक बन के निकलता हूँ.....
उसको दीप दिखाता हैं
शाम ढले मे ही परछाईं पर
पैरों को रख ठुमक -ठुमक कर चलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
मैं जलता हूँ फिर बुझता हूँ
मैं बुझता हूँ फिर-फिर जलता हूँ
हाँ मैं
रह -रह कर बुझता हूँ जलता हूँ
मैं तो दीया हूँ मैं फिर भी जलता हूँ.....।।
हाँ मैं तो दीया हूँ....।।।
मैं तुमको सोचता हूँ......
एक अलसाई सुबह
अंगड़ाई मेंं
मैं तुमको सोचता हूँ ..
भटकी हुई तितली
(भूल से)
लिपटी
परदे के फूल से ।।
भीगी हवा में भी काँप गया परदा
मैं तुमको सोचता हूँ......
पूनम से
पहली वाली रात
चाँदनी कुछ ठिठकी-सी
घर की दीवार से
रातरानी की महकी - बहकी साँसे
गरमी मेंं आँगन की चारपाई पर
मैं तुमको सोचता हूँ.....
मौसम कोई हो
रूत भी कोई हो
किसी करवट हो जिन्द़गी
मैं
तुमको सोचता हूँ ..... ।।।
रश़्क हो जाएगा ...इश़्क हो जाएगा...
रास्ते ख़ामोश थे
और मंजिलें बेचैन
ख्वा़ब में हम ढूंढते थे..
अपने दिल का चैन
मील के पत्थर की आँखें
कब की थीं पथरा चुकींं
आस भी अब थी उदास
चाहत भी इसकी जा चुकी...
उम्मीद की पगडंडियों पर
ये कौन हैं जो चल पड़ा
तकदीर की बाहेंं मरोड़े
है सीना ताने यूं खड़ा...
जब टूट जाये हर आस तो
आवाज़ देकर देखना
गै़रत को अपने हौसले को
ललकार देकर देखना
एक इशारे पर वो तेरा
हर काम करके जायेगा
किस्मत को भी तेरे फ़ैसले से
रश़्क हो जाएगा..... इश़्क हो जाएगा ।।।
ग़मों के शुक्रगुज़ार
पहलू मेंं आ कर तकिए भिगोते है
हम चहक उठते हैं
मोतियों को चुनते हैं,माला पिरोते हैं
सच कहते हैं-
आज तक हमने
जितने भी ख़ज़ाने लुटाए हैं
वो हमारे लिए
सिर्फ जख्म़ो ने जुटाए हैं
जब भी-
कोई खुशी कानों में
नगमा गुनगुनाती है है
कदम लड़खड़ाते हैं
जिन्द़गी राह भटक जाती है ।।।
इसलिए -
आज भी हम ग़मों के इतने शुक्र गुज़ार है
कि एक-एक सदमे पर
हजारों खुशियाँँ निसार हैं....।।।
ग़मों के शुक्रगुज़ार
पहलू मेंं आ कर तकिए भिगोते है
हम चहक उठते हैं
मोतियों को चुनते हैं,माला पिरोते हैं
सच कहते हैं-
आज तक हमने
जितने भी ख़ज़ाने लुटाए हैं
वो हमारे लिए
सिर्फ जख्म़ो ने जुटाए हैं
जब भी-
कोई खुशी कानों में
नगमा गुनगुनाती है है
कदम लड़खड़ाते हैं
जिन्द़गी राह भटक जाती है ।।।
इसलिए -
आज भी हम ग़मों के इतने शुक्र गुज़ार है
कि एक-एक सदमे पर
हजारों खुशियाँँ निसार हैं....।।।
Ghunghat kish liye hai
जब परदा उतर चुका हो
आँखों में लाज का जाब
पानी भी मर चुका हो ।
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
वो अल्हड़ सी पगडंडियांं तो
अब हो चुकी अधेड़ हैं
न तितलियाँ, न चिड़ियाँँ
न वो पीपल का पेड़ हैं।
फिर गांव के उस चित्र में,पनघट किस के लिए हैं? मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
अजी,हाथ तो मिले हैंं
मगर सुस्त-सा कसवा है
मुस्कानों की दरार से
बस,झाँकता दुराव है
फिर यूँ ही जज्बात का,जमघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
पानी की काफी बूंदें
आँखों में ढाल चुकी हैं
कुछ पी गई हवाएँ
कुछ मेघों से मिल चुकी हैं
फिर हथेली में मिट्टटी का, ये घट किस लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस लिए है?
...... ...... ...... ......
जब परदा उतर चुका हो
आँखों में लाज का जाब
पानी भी मर चुका हो ।
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
वो अल्हड़ सी पगडंडियांं तो
अब हो चुकी अधेड़ हैं
न तितलियाँ, न चिड़ियाँँ
न वो पीपल का पेड़ हैं।
फिर गांव के उस चित्र में,पनघट किस के लिए हैं? मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
अजी,हाथ तो मिले हैंं
मगर सुस्त-सा कसवा है
मुस्कानों की दरार से
बस,झाँकता दुराव है
फिर यूँ ही जज्बात का,जमघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
पानी की काफी बूंदें
आँखों में ढाल चुकी हैं
कुछ पी गई हवाएँ
कुछ मेघों से मिल चुकी हैं
फिर हथेली में मिट्टटी का, ये घट किस लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस लिए है?
...... ...... ...... ......
गाड़ी कौन चलाएगा
मेरे चीखने चिल्लाने से
हड़बड़ा कर
मेरी पत्नी नींद से जाग गयीं
मैंने कहा, सुनती हो -
कल रात पड़ोसी मुसद्दीलाल की बीवी
ड्राइवर के साथ भाग गयी ।
पत्नी चौंक गई
हैरान हो कर कहने लगी
हे प्रभु , ये सच है तब तो ग़ज़ब हो जाएगा
मैं तो सोच कर ही सिहर जाती हूँ कि
अब बेचारे मुसद्दीलाल की
बड़ी वाली गाड़ी कौन चलाएगा ।।
मैं गुस्से में गरजा
" बेवकूफ औरत
माहक मुझे सता रही हो......
समस्या कोई और है
तुम तो कोई और ही बता रही हो...।। "
मजे की बात है
कि आज कल...........
हर बड़ा आदमी यही काम कर रहा है ,
समस्या कुछ और होती है
हल के लिए
कुछ और ही इंतजाम कर रहा है.....।।
इस लिए अब सचमुच
समस्या यह नहीं कि
मुसद्दीलाल / बिन बीवी के
इतनी परेशानियों में जीवन कैसे बिताएगा
बल्कि मुद्दा ये हो गया है कि
मुसद्दीलाल की गाड़ी कौन चलाएगा....।।।
मेरे चीखने चिल्लाने से
हड़बड़ा कर
मेरी पत्नी नींद से जाग गयीं
मैंने कहा, सुनती हो -
कल रात पड़ोसी मुसद्दीलाल की बीवी
ड्राइवर के साथ भाग गयी ।
पत्नी चौंक गई
हैरान हो कर कहने लगी
हे प्रभु , ये सच है तब तो ग़ज़ब हो जाएगा
मैं तो सोच कर ही सिहर जाती हूँ कि
अब बेचारे मुसद्दीलाल की
बड़ी वाली गाड़ी कौन चलाएगा ।।
मैं गुस्से में गरजा
" बेवकूफ औरत
माहक मुझे सता रही हो......
समस्या कोई और है
तुम तो कोई और ही बता रही हो...।। "
मजे की बात है
कि आज कल...........
हर बड़ा आदमी यही काम कर रहा है ,
समस्या कुछ और होती है
हल के लिए
कुछ और ही इंतजाम कर रहा है.....।।
इस लिए अब सचमुच
समस्या यह नहीं कि
मुसद्दीलाल / बिन बीवी के
इतनी परेशानियों में जीवन कैसे बिताएगा
बल्कि मुद्दा ये हो गया है कि
मुसद्दीलाल की गाड़ी कौन चलाएगा....।।।
.....,, ना मांग सकी बांसुरी ......,,
राधा की चाह थी कृष्ण को ही पाने को
मीरा की भक्ति थी प्रेम गीत गाने की
कृष्ण की ही धुन में जो रमी रही बावरी
आपने लिए कुछ भी ना मांग सकी बांंसुरी .....।।
सब जानते हैं राधा मिल लेती थीं छुप-छुप के
गा लेती थी मीरा विरह घुट-घुट के
पर अधरों से लगी लगी जो बांटती थी मधुरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी....।।
नयन बिन ही सुर ने कृष्ण को निहार लिया
छंदों में बांध -बांध जी भर प्यार किया
श्याम जी सांवरिया और सुर बने सांवरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी।।
रूक्मिणी की मांग भरी द्रौपदी को चीर दिया
व्यथा विकल पार्थ को रणभूमि में धीर दिया
निष्काम कर्म योगनी करती रही चाकरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी।।
*आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी*
मीरा की भक्ति थी प्रेम गीत गाने की
कृष्ण की ही धुन में जो रमी रही बावरी
आपने लिए कुछ भी ना मांग सकी बांंसुरी .....।।
सब जानते हैं राधा मिल लेती थीं छुप-छुप के
गा लेती थी मीरा विरह घुट-घुट के
पर अधरों से लगी लगी जो बांटती थी मधुरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी....।।
नयन बिन ही सुर ने कृष्ण को निहार लिया
छंदों में बांध -बांध जी भर प्यार किया
श्याम जी सांवरिया और सुर बने सांवरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी।।
रूक्मिणी की मांग भरी द्रौपदी को चीर दिया
व्यथा विकल पार्थ को रणभूमि में धीर दिया
निष्काम कर्म योगनी करती रही चाकरी
आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी।।
*आपने लिए कुछ भी न मांग सकी बांसुरी*
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Gamhon ke shukrgujar
DINESH TOPPO
July 26, 2018
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ग़मों के शुक्रगुज़ार
पहलू मेंं आ कर तकिए भिगोते है
हम चहक उठते हैं
मोतियों को चुनते हैं,माला पिरोते हैं
सच कहते हैं-
आज तक हमने
जितने भी ख़ज़ाने लुटाए हैं
वो हमारे लिए
सिर्फ जख्म़ो ने जुटाए हैं
जब भी-
कोई खुशी कानों में
नगमा गुनगुनाती है है
कदम लड़खड़ाते हैं
जिन्द़गी राह भटक जाती है ।।।
इसलिए -
आज भी हम ग़मों के इतने शुक्र गुज़ार है
कि एक-एक सदमे पर
हजारों खुशियाँँ निसार हैं....।।।
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Ghunghat kish liye hai
DINESH TOPPO
July 26, 2018
0
Ghunghat kish liye hai
जब परदा उतर चुका हो
आँखों में लाज का जाब
पानी भी मर चुका हो ।
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
वो अल्हड़ सी पगडंडियांं तो
अब हो चुकी अधेड़ हैं
न तितलियाँ, न चिड़ियाँँ
न वो पीपल का पेड़ हैं।
फिर गांव के उस चित्र में,पनघट किस के लिए हैं? मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
अजी,हाथ तो मिले हैंं
मगर सुस्त-सा कसवा है
मुस्कानों की दरार से
बस,झाँकता दुराव है
फिर यूँ ही जज्बात का,जमघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
पानी की काफी बूंदें
आँखों में ढाल चुकी हैं
कुछ पी गई हवाएँ
कुछ मेघों से मिल चुकी हैं
फिर हथेली में मिट्टटी का, ये घट किस लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस लिए है?
...... ...... ...... ......
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