Ghunghat kish liye hai
जब परदा उतर चुका हो
आँखों में लाज का जाब
पानी भी मर चुका हो ।
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
वो अल्हड़ सी पगडंडियांं तो
अब हो चुकी अधेड़ हैं
न तितलियाँ, न चिड़ियाँँ
न वो पीपल का पेड़ हैं।
फिर गांव के उस चित्र में,पनघट किस के लिए हैं? मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
अजी,हाथ तो मिले हैंं
मगर सुस्त-सा कसवा है
मुस्कानों की दरार से
बस,झाँकता दुराव है
फिर यूँ ही जज्बात का,जमघट किस के लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस के लिए है?
पानी की काफी बूंदें
आँखों में ढाल चुकी हैं
कुछ पी गई हवाएँ
कुछ मेघों से मिल चुकी हैं
फिर हथेली में मिट्टटी का, ये घट किस लिए है?
मैं फिर से पूछता हूँ, ये घुंघट किस लिए है?
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