ग़मों के शुक्रगुज़ार
पहलू मेंं आ कर तकिए भिगोते है
हम चहक उठते हैं
मोतियों को चुनते हैं,माला पिरोते हैं
सच कहते हैं-
आज तक हमने
जितने भी ख़ज़ाने लुटाए हैं
वो हमारे लिए
सिर्फ जख्म़ो ने जुटाए हैं
जब भी-
कोई खुशी कानों में
नगमा गुनगुनाती है है
कदम लड़खड़ाते हैं
जिन्द़गी राह भटक जाती है ।।।
इसलिए -
आज भी हम ग़मों के इतने शुक्र गुज़ार है
कि एक-एक सदमे पर
हजारों खुशियाँँ निसार हैं....।।।

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